Wednesday, November 14, 2007

हनुमान जी क्षमा करें, पापी पेट का सवाल है____!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मेरा नाम रामशरण है। फिलहाल मैं मंत्रालय के डिप्‍टी सेक्रेटरी साहब का ड्राइवर हूँ। फिलहाल इसलिए कह रहा हूँ हम ड्राइवरों का तबादला होता रहता है। कभी एक सेक्रेटरी के पास कभी दूसरे डिप्‍टी सेक्रेटरी के पास। मंत्रालय में सेक्रेटरियों की कमी नहीं है, अलबत्ता ड्राइवरों की कमी ज़रूर है।

हम हैं तो ड्राइवर, पर साहब लोग उम्‍मीद करते हैं कि हम चपरासियों का काम भी करें। कभी कभार तो ठीक है, पर रोज़-रोज़ हमें यह पसंद नहीं है। कई बार साहब अच्‍छे मिल जाते हैं, हमारी भावनाओं का ख्‍याल रखते हैं। कोई बेवजह डाँट-डपट करता है तो हम भी कह देते हैं, "कर दो ट्रांसफ़र।" बस इतना सुनकर अधिकांश साहब शांत हो जाते हैं। ट्रांस़फ़र कर तो दें, पर नया ड्राइवर मिलता इतना आसान नहीं होता।

मैं अपने काम से मतलब रखता हूँ। अपना काम करो और राम का नाम लो। अंडर सेक्रेटरी साहब ऑफिस की गाड़ी का इस्‍तेमाल घरेलू कामों में करते हैं। कहते हैं, "घर चले जाओ, तुम्‍हारी आंटी को थोड़ी मार्केटिंग करनी है।" इसमें कौन सी नई बात है, सभी ऐसा करते हैं। जो साहब का आदेश है वही हमारे लिए हुक्‍म है और वही क़ानून। पर साहब की फैमिली (पत्‍नी), बाप रे बाप, फैमिली को राजी रखना बड़ा मुश्किल काम होता है। साहब की फैमिली घड़ी-घड़ी डांटती हैं, "मेरा थैला पकड़ो", "यहाँ खड़ा करो" "तुम्‍हें मैनर्स नहीं है", "मैं साहब से तुम्‍हारी शिकायत कर दूँगी"। अब लेडिस से बहस कौन करे? मैं तो साहब का बहुत लिहाज करता हूँ वरना जी करता है बीच रास्‍ते गाड़ी से उतार दूँ।

पिछले हफ़्ते मैं आंटी जी (साहब की फैमिली) को ब्‍यूटी पार्लर ले जा रहा था। जाने क्‍या हुआ आंटी ने आज बड़े अच्‍छे से बात की, "रामशरण तुम कौन से भगवान को मानते हो?"

"मैं सभी भगवान को मानता हूँ, राम, कृष्‍ण, शंकर....।" मैं डरते डरते कहने लगा। मेरी समझ में कुछ नहीं आया था। लग रहा था कि यदि एक किसी भगवान का नाम लूँगा तो नाराज़ हो जाएंगी।

"अरे नहीं, सब नहीं एक बताओ, किसकी पूजा अधिक करते हो?" आंटी ने पूछा।

"मैं हनुमान का भक्‍त हूँ। उन्‍हीं की पूज़ा रोज़ करता हूँ।" मैंने कह दिया। अब क्‍या करूँ, जो होता है सो हो।

"एक बात सच-सच बताओगे? तुम्‍हें हनुमान जी की क़सम है, क्‍या साहब इस गाड़ी से किसी मैडम को गेस्‍ट हाउस ले जाते हैं?"

"आंटी मैं आपसे झूठ क्‍यों बालूँगा?" मैं हकबका गया।

"देखो तुम्‍हें तुम्‍हारे हनुमान जी की क़सम है, सच-सच बताना।"

मैडम ने बड़ा बुरा फँसा दिया। इधर कुआँ तो उधर खाई। साहब ऑफिस के काम से या किसी मीटिंग के सिलसिले में गेस्‍ट हाउस तो जाते रहते थे। कई बार पी.आर. ऑफ़ीसर मिसेज जोशी भी साथ जाती हैं। यह सरकारी गाड़ी है, इसमें तो कोई भी बैठ सकता है। पर मैंडम को कौन समझाए? कुछ पूछना है तो सीधे साहब से पूछो, मुझ गरीब को क्‍यों फँसा रही हो। यदि मेरे मुँह से एक भी शब्‍द ग़लत निकल गया तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

"मैडम आज चाहे जिसकी क़सम दे दें, मैं आपसे बिलकुल झूठ नहीं बोलूँगा। अपनी ड्यूटी में, मैंने अपनी जानकारी में मैंने किसी मैडम को नहीं बिठाया है।"

"देखो, रामशरण तुम झूठ बोल रहे हो, सच बताओ। मुझे सब पता है।"

"हनुमान जी की कसम आंटी जी, मैंने आपके अलावा किसी मैडम को नहीं बिठाया।"

आंटी मुझ पर गुस्‍सा करने लगी। अब वह अपने पुराने रूप में लौट आई, "तुम्‍हें मैनर्स नहीं है", "मैं साहब से तुम्‍हारी शिकायत कर दूँगी"।

मैं मन ही मन भगवान से माफ़ी मांग रहा था। हे हनुमान जी, मुझे माफ़ कर दो। नौकरी की सवाल है। मुझे इस मुसीबत से बचाओ और जल्‍दी से जल्‍दी मेरा ट्रांसफ़र कहीं और कर दो।

5 comments:

अनूप शुक्ल said...

वाह्! बताना प्रार्थना मंजूर् हुयी कि नहीं। :)

Nityanand said...

AAp Chinta Na kare ... Hanuman ji bahoot Dayaloo hai ... Aisi chhoti - Moti bato ko mind nahi karte :) :)

CrippLeD SaM said...

|| Om Shri Hanumate Namah: ||

Shri Hanuman Pictures, Hanuman Chalisa Mp3 and other Bhajans can be downloaded at:

http://hanumanji.wordpress.com

YouRs SinCereLy M!sTer CrippLeD SaM

बाल किशन said...

फंस गए हो जनाब. अब तो हनुमान ही जान बचाए.

आस्तीन का अजगर said...

आनंद के पोस्ट काफी दिलचस्प हैं. लिखते रहिए.