Wednesday, August 6, 2008

कहीं आपको लीडरशिप के गुर सिखाने वाली कोई सीडी मिले तो बताना ज़रूर...!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


पिछले हफ़्ते आशू 'साला' बोलना सीख आया।

हम पैरेंट्स के लिए यह बड़ा कठिन समय है। कोई एक परेशानी हो तो कहूँ। और पिछले हफ़्ते तो आशू कहीं से 'साला' सीखकर आ गया है।

पहले मैं आपको अपना परिचय देता हूँ। मेरा नाम आर.एल. श्रीवास्‍तव है, हाईस्‍कूल में लेक्‍चरर के पोस्‍ट पर हूँ। मैं खुद पोस्‍ट ग्रेजुएट हूँ इसलिए नॉलेज का महत्‍व समझता हूँ। आज के दौर में औसत की गुंजाइश नहीं है। जो सबसे तेज़ होगा वही कामयाब बनेगा। इसलिए हमने अपने आशू को सबसे बढ़ि‍या स्‍कूल में डाला है। सभी हाई क्‍लास लोगों के बच्‍चे उसमें पढ़ने आते हैं। अब आप इसे बड़ाई न समझें, अभी से आशू कंप्‍यूटर में गेम खेल लेता है। कार रेस में तो वह कम्‍प्‍यूटर को भी हरा देता है। आजकल ज़माना ही कम्‍प्‍यूटर का है, मैं आशू को शुरू से कंप्‍यूटर सिखा रहा हूँ।

यहाँ हमारी सोसाइटी ठीक नहीं है। आस-पड़ोस के बच्‍चे दिन भर धमाचौकड़ी मचाते हैं। कोई गिर रहा है, तो कोई रो रहा है। किसी को कोई सलीका नहीं। बच्‍चों पर संगति का बहुत असर पड़ता है, इसलिए मैं आशू को भरसक घर पर ही रखता हूँ। कोई ज़रूरत नहीं है, बाहर जाने की। कहीं गिर गया, कोई चोट लग गई तो! विश्‍वास सर के बच्‍चों को देखो, कितने मैनर्स से रहते हैं! यहाँ के तो बिलकुल जंगली हैं।

आजकल टी.वी. पर बहुत से ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आते हैं। डिस्‍कवरी देखो। एनिमल प्‍लेनेट देखो। पर कोई बच्‍चों को बाँध कर तो नहीं रख सकता। कुछ दिन पहले आशू खेलने गया तो गाली सीख कर आया। हमें तब पता चला जब उसने अपनी मम्‍मी से पूछा "माँ 'साला' क्‍या होता है?"

तब से आशू का बाहर जाना बिलकुल बंद। घर पर रहो। टीवी है। कार्टून पसंद है तो उसे देखो। कंप्‍यूटर पर गेम्‍स हैं, खेलो। मैंने आशू के लिए कई सीडी इकट्ठा की है। गुड हैबिट्स वाली सीडी है, सिंड्रेला की कहानी है, एक सीडी में तो मैथ्‍स सिखाया जाता है, एन्‍साइक्‍लोपीडिया भी है। यह सीडी भी बड़े कमाल की चीज़ है। मैं तो हैरान रह जाता हूँ। कार्टून और पिक्‍चर के जरिए कोई भी विषय बड़े अच्‍छे तरीक़े से से समझाया जाता है। इसके कोर्स के अलावा भी बहुत सी जानकारी मिल जाती है।

हमारा आशू थोड़ा शर्मीला है। कहीं भी बातें करते हुए शर्माता है। मैं उसे बोल्‍ड बनाना चाहता हूँ। कम्‍यूनिकेशन स्किल्‍स वाली सीडी मैं उसके लिए ले आया हूँ। दो एक विषयों पर और ढूँढ रहा हूँ, बनी तो होगी ही, पर मिल नहीं रही है। अरे, लीडरशिप और टीमवर्क वाली। मुझे पूरा विश्‍वास है कि आजकल ऐसे विषय बहुत पॉपुलर हैं। कहीं आपको लीडरशिप के गुर सिखाने वाली कोई सीडी मिले तो बताना ज़रूर...!

17 comments:

Udan Tashtari said...

वो तो बता देंगे मगर आप कहाँ गुम रहे भई इत्ते दिन. जरा वो तो बतायें. :)

Neeraj Rohilla said...

हम तो कन्फ़्यूजिया गये । ये व्यंग ही है न?

आशू को खूब बाहर खेलने भेजो, दुनियादारी और लीडरशिप के होल पैकेज में गालिंयाँ भी मिलेंगी । मुफ़्त हाथ आये तो क्या हर्ज है :-)

अनिल रघुराज said...

आपने याद दिला दी। मुझसे साल भर बड़े भाई कहीं से साला सीख कर आए और मुझे साला बोल दिया। फिर अम्मा ने क्या धुनाई की थी उनकी।
वाकई परकाया प्रवेश में आप सिद्धहस्त हैं।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

जो बात एक शगल बन जाए
उस पर लोगों का नज़रिया
ऐसा ही मोड़ लेता है.
आजकर ये कम्युनिकेशन
लीडरशिप
टीम बिल्डिंग
आम तौर पर
एक फैशन जैसे
ज़ुमले होते जा रहे हैं.
आपने गहरी नब्ज़ टटोली.
=======================
बधाई
डा.चन्द्रकुमार जैन

swati said...

achha laga aalekh

अनुराग said...

टी वी दिखाते रहिये देखिये...dyanamik हो जायेगा ....फ़िर आप दूसरी सी डी ढूँढेगे

योगेन्द्र मौदगिल said...

शुभकामनाएं पूरे देश और दुनिया को
उनको भी इनको भी आपको भी दोस्तों

स्वतन्त्रता दिवस मुबारक हो

haan ANURAAG ji baat jaroor maniyega.

आस्तीन का अजगर said...

अरे साला ही तो बोलना सीखा है.. अभी तो लंबा सफर बाकी है. अच्छे लड़कों को किसी भी स्कूल में डालो मुझे नहीं लगता उनके बिगड़ने में कोई अन्तर आता है. लड़कों के बिगड़ने में एक अद्भुत सा समाजवाद है, चाहे मुनिसपेलिटी के स्कूल में पढ़ो या मथुरा रोड के डीपीएस में. कल को जब दुनिया से लड़ने- झगड़ने और रेलगाड़ी में अपनी सीट चीनने और ट्रैफिक जम में उस बदतमीज टैक्सी या ट्रक या पुलिस वाले से निपटने में क्या स्कूल का आइडेंतिटी कार्ड कम आएगा? जब पप्पू को कोई फर्क नहीं पड़ रहा साला कहे जाने पर तो फिर..

Anonymous said...

mahodaya,
aap itane achhe vichar late kahan se ahin.
jo samajg jindagi ki aapko hai wo bahut kam logon ko hota hai

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

yaksh said...

zindagi kya hai...kitabo ko hata kar dekho...par ye sale kaha mante hai.kitab padvane se achcha pappu ko kitab likhne layak banaya jaye

"SHUBHDA" said...

मेरी कल्पना में घूम रहा है एक ऐसी सोसाइटी का प्ले ग्राउंड, जहाँ खेलने वाले सभी बच्चे 'औसत' वाले हैं। क्यों की औसत से तेज वाले बच्चे खेलते नहीं है। घर में बंद रह कर सीडी से शिक्षा और संस्कार पाते है......... आज हर घर में बचपन "आशु" हो कर रह गया है। ठीक ही कहा है " आज के दौर में औसत की गुंजाइश नहीं है। जो सबसे तेज़ होगा वही कामयाब बनेगा।" कल्पना कीजिये की इस आलेख का पाठक कोई ऐसा पेरेंट भी हो जिसका "आशु" औसत तो क्या सामान्य से भी कम "विमंदित" की गिनती में आता हो? उसे सोसाइटी के आशु से अलग कर के कहाँ रखा जा सकता है?....... अब मेरी नजरों पर तो बस एक ही चश्मा लगा है, पता नहीं सब कुछ उसी से क्यों देखती हूँ ?

शेष शुभ, इति... शुभदा

अंकुर गुप्ता said...

आपने एक अच्छा खासा व्यंग्य कसा है एक वर्ग के ऊपर जो अपने बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा देता है फ़िर यह भी सोचता है कि उसका बच्चा आल राउंडर बने.
लीडरशिप जैसी चीजें अकेले में केवल सीडी से नही सीखी जा सकती हैं. उसके लिये लोगों से मिलना जुलना जरूरी होता है. इस वर्ग के लोगों से मैं यही कहना चाहूंगा कि अगर अपने बच्चों पर बुरी संगत का असर रोकना है तो अपने बच्चे को इतना मजबूत बनायें कि वह स्वयं दूसरों को गाली देने से रोके.

रंगनाथ सिंह said...

आपका ब्लॉग देखा. आपके व्यंग करने की अदा पसंद आई.
आपने "मुक्तिबोध" की जो हौसला अफजाई की है उसके लिए धन्यवाद. मैं नहीं जानता की कितने लोग मुक्तिबोध को पढ़ना चाहते हैं ? लेकिन जो चाहते हैं उनके लिए पढ़ने को कुछ हो यही प्रयास है....रोज़गार के अतिरिक्त कुछ और करने में एक सार्थकता महसूस होती है. ब्लॉग शुरू करने का एक कारण ये भी है.

Vijay Kumar Sappatti said...

aanand bhai ,

aajkal har ghar me ek aashu hai yaar.. ab ya to baccho ko ghar me rakh lo ya baahr bhej do .. par kisi bhi cheej ki koi guarantee nahi hai ..ki kya seekhenga ,kya bolenga ...

aapne bahut aacha likha hai ..

aapko meri dil se badhai ..

meri nayi kavita padhkar apna pyar aur aashirwad deve...to khushi hongi....

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

Pinku said...

You have beautifully explained the concern of parents about parenting and the changing socity and reflected its effect on our children.
Nice reading it.
Avatar Meher Baba Ji Ki Jai
Lots of Love
Yours
Pinku
avtarmeherbaba.blogspot.com
lifemazedar.blogspot.com
www.trustmeher.org

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

"SHUBHDA" said...

मेरी कल्पना में घूम रहा है एक ऐसी सोसाइटी का प्ले ग्राउंड, जहाँ खेलने वाले सभी बच्चे 'औसत' वाले हैं। क्यों की औसत से तेज वाले बच्चे खेलते नहीं है। घर में बंद रह कर सीडी से शिक्षा और संस्कार पाते है......... आज हर घर में बचपन "आशु" हो कर रह गया है। ठीक ही कहा है " आज के दौर में औसत की गुंजाइश नहीं है। जो सबसे तेज़ होगा वही कामयाब बनेगा।" कल्पना कीजिये की इस आलेख का पाठक कोई ऐसा पेरेंट भी हो जिसका "आशु" औसत तो क्या सामान्य से भी कम "विमंदित" की गिनती में आता हो? उसे सोसाइटी के आशु से अलग कर के कहाँ रखा जा सकता है?....... अब मेरी नजरों पर तो बस एक ही चश्मा लगा है, पता नहीं सब कुछ उसी से क्यों देखती हूँ ?




बिलकुल सहमत!