Tuesday, October 23, 2007

राम! बस दस मिनट और रूको _____


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मैं संजयनगर दशहरा समिति का अध्‍यक्ष मनोहरलाल बोल रहा हूँ। जितने भी दर्शक आए हैं शांति बनाए रखें और वह आतिशबाजी का आनंद लें। भगवान राम भी अपनी वानर सेना के साथ मैदान में पधार चुके हैं। रावण दहन शीघ्र ही किया जाएगा। मंच पर हमारे मुख्‍य अतिथि श्री राजेश पटेल और उनके छोटे भाई विवेक पटेल, दोनों आ चुके हैं। श्री राजेश पटेल मेरे बड़े भाई जैसे हैं और यहाँ के जाने माने समाजसेवक हैं, और जनता के प्रेम में मज़बूर होकर उन्‍हें राजनीति ज्‍वाइन करना पड़ा और पिछले 10 वर्ष से राजनीति में सक्रिय हैं। श्री राजेश पटेल ने इस दशहरा उत्‍सव के आयोजन में अपना भरपूर योगदान दिया है और हमेशा देते रहेंगे। मैं बहुजन समाज पार्टी के युवा नेता भाई कस्‍तूरी लाल से अनुरोध करता हूँ कि वह मंच पर आकर राजेश पटेल जी का स्‍वागत करें।

अब मैं कपूर ज्‍वेलर्स के श्री नेकचंद जैन जी से अनुरोध करता हूँ कि वह भाई राजेश पटेल जी का स्‍वागत करें। श्री नेकचंद ने तन-मन-धन से इस दशहरा समिति के आयोजन में सहयोग दिया है।

भारतीय युवा मोर्चा के श्री गुमान भाई भी राजेश पटेल जी का स्‍वागत करें। यह विशाल कुंभकर्ण श्री गुमान भाई के सौजन्‍य से बना है। कृपया जल्‍दी-जल्‍दी मंच पर आएं। गुमान भाई ! और साथ में कमल त्‍यागी भी आ जाएँ।

एल.आई.जी. कल्‍याण समिति के सचिव श्री गौतम मंडल हमारे नेता श्री राजेश पटेल जी का स्‍वागत करेंगे। कृपया ताली बजाते जाएँ। दर्शकों से मेरा निवेदन है कि घेरे के अंदर न घुसें। सिक्‍योरिटी गार्ड और वालंटियर उधर देखिए क्‍या हो रहा है?

श्री सखाराम सेठ श्री राजेश पटेल का स्‍वागत करें।

श्री विद्याधर, सेठ गजानन, सेठ कर्मचंद श्री राजेश पटेल का स्‍वागत करें। तीनों एक साथ आ जाएँ। श्री राम जी, अपनी वानर सेना को सम्‍हालिए, बस थोड़ी देर और है, फिर पुतला दहन करते हैं। दर्शक कृपया जल्‍दबाजी न करें।

अखंड जागरण समिति, कल्‍याणगंज के मुखिया श्री सुखबीर जी हमारे मुख्‍य अतिथि श्री राजेश पटेल का स्‍वागत करेंगे।

सुप्रसिद्ध समाजसेवक यासीन भाई, श्री राजेश पटेल का स्‍वागत करेंगे। दिगंबर कुर्मी, प्रहलाद सोलंकी, गणेशचंद माँझी श्री राजेश पटेल का स्‍वागत करेंगे।

संजयनगर के प्रधान श्री कालूराम पासवान मुख्‍य अतिथि राजेश पटेल का स्‍वागत करेंगे। श्री नरेंद्र उप प्रधान भी साथ आ जाएँ। श्री रामखिलावन, श्री तेजेंदर खन्‍ना, श्री .... अरे, राम जी एक मिनट और रूकिए। भगवान राम मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ बस दस मिनट और फिर पुतला...। हे भगवान, बाक़ी का स्‍वागत बाद में करेंगे... मैं राजेश पटेल जी और श्री विवेक पटेल जी से अनुरोध करता हूँ कि भगवान राम के साथ जाएँ और पुतला दहन में सहयोग करें। पटेल साहब दौड़कर जाइए, अबे राम ! रूक ! पटेल साहब को साथ लेता जा...

Saturday, October 20, 2007

"ट्रांसफ़र का काम है" कहना पर्याप्‍त नहीं है ____


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मेरा नाम सेवाराम है। शिक्षा विभाग में नौकरी करता हूँ। नहीं जी, मास्‍टर (शिक्षक) नहीं हूँ। ऐसी किस्‍मत कहाँ। मैं तो मामूली सा क्‍लर्क हूँ। पोस्टिंग जिला शिक्षा विभाग मुख्‍यालय, होशंगाबाद में जिला शिक्षा अधिकारी के साथ है। मेरे नाम की तरह ही मेरा काम भी सेवा करने का है।

मुझे शिकायत है कि आजकल लोग अपने कामों को लेकर काफ़ी लापरवाह हो गए हैं। कोई भी लेन-देन या हिसाब-किताब जुबानी रखना ठीक नहीं होता, कभी भी धोखा हो सकता है। अभी पिछले माह की बात है। मेरे पास रामायण प्रसाद आया।

"यह लीजिए दस हज़ार रूपए, ट्रांसफ़र का केस है।" रामायण प्रसाद का काम 'लोगों का काम करवाना' है। नेताओं के आगे पीछे भी फिरता रहता है। लड़का तेज़ है, आगे जाएगा।

"किसका ट्रांसफ़र?" मैंने पूछा।

"तिवरा के रमेश शर्मा, प्राइमरी टीचर का।"

साल में एक बार ट्रांसफ़र का सीजन आता है। इस समय हर सरकारी नौकरी धारी शिक्षक सतर्क हो जाता है। जिसे कोई भूल-सुधार करनी होती है, पूरा मौक़ा मिलता है। कोई पर्दा नहीं है, हर आदमी जानता है कि काम कराना है तो किससे संपर्क करना पड़ेगा।

"दरख़्वास्‍त कहाँ है?" हर काम के लिए आवेदन पत्र देना आवश्‍यक होता है।

'वो तो नहीं है। अरे आप लोगों भी कहाँ दरख़्वास्‍त वगैरह के चक्‍कर में पड़े हैं। पैसा पूरा एडवांस में दिया है, फिर क्‍या दिक्‍कत है।"

"क्‍या काम है, यह तो पता चले।"

"अभी बताया न, ट्रांसफ़र का काम है।"

"अरे भैया, ट्रांसफ़र रोकना है कि ट्रांसफ़र करवाना है?"

"ट्रांसफ़र रोकने का काम होगा...शायद। कोई ट्रांसफ़र करवाने के पैसे थोड़े ही देता है?" वह हड़बड़ाया।

"ऐसे शायद से काम नहीं चलता भैया, पूरा पक्‍का करो।

"मैं पक्‍का कह रहा हूँ ट्रांसफ़र रोकने का ही काम है। आप तो बड़े शक्‍की आदमी हैं।"

"इसमें मज़ाक नहीं है, ज़िंदगी का सवाल है। आप लोग काम को सीरियसली लिया करो।" मैंने उसे समझाया। "हमें हज़ारों ट्रांसफ़रों का हिसाब रखना पड़ता है। ऐसा करो, पैसा यहीं छोड़ दो। जाकर दरख़्वास्‍त बना लो, ट्रांसफ़र करना है, कहाँ करना है या रोकना है सब कुछ लिखा होना चाहिए?"

वह भुनभुनाता हुआ चला गया।

पहले एक बार इसी तरह गड़बड़ हो गई थी। किसी सज्‍जन ने अपने दुश्‍मन का ट्रांसफ़र रिमोट एरिया में करने के लिए पैसे दिए थे, पर गलती से उनका ही ट्रांसफ़र हो गया। लिया गया पैसा वापस तो हो नहीं सकता था क्‍योंकि उसमें अधिकारी से लेकर चपरासी तक का हिस्‍सा रहता है, तो अगले साल दो ट्रांसफ़र फोकट में करने पड़े, बेइज्‍जती हुई सो अलग।

आप ही बताइए "ट्रांसफ़र का काम है" कहने से क्‍या क्‍लीयर होता है? अब यह बात इन झोला छाप नेताओं को कौन समझाए___।

Thursday, October 18, 2007

मैं सच्‍चे दिल से ठाकुर साहब की मदद करना चाहता हूँ___


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मैं पड़ोसियों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ। बाल-बच्‍चेदार आदमी हूँ। सुख-दुख तो लगा रहता है। जब हम किसी के काम आएंगे तभी तो कोई हमारे भी काम आएगा। यदि कोई हमारे काम न भी आए तो क्‍या हुआ, इंसानियत के नाते हमारा जो भी फ़र्ज बनता है, उसे पूरा करना चाहिए।

मैंने एक उसूल बना लिया है। जहाँ भी मौका मिले मदद करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। पड़ोस में ठाकुर साहब के घर शादी है। मैं जानता हूँ कि शादी का घर है, इसमें हज़ारों काम होते हैं। ऐसे में सच्‍चे पड़ोसी का धर्म निभाने चला गया।

"और ठाकुर साहब, क्‍या-क्‍या काम बचा है?"

"अजी, आपके आशीर्वाद सब काम ठीक ही चल रहा है। सारा काम कांट्रैक्‍टर को दे दिया है। कैटरर, टेंट वगैरह सब वह ठेकेदार देखेगा।"

"फिर भी आप नज़र रखिएगा। इन ठेकेदारों का कोई भरोसा नहीं।"

"वो तो है जी, उससे रोज-रोज मिलकर पूरे काम की रिपोर्ट लेता हूँ। वैसे, बताते हैं कि ये ठेकेदार बढ़ि‍या आदमी है।"

"और मेरे लायक कोई सेवा?" मैंने पूछा। हमारे जमाने में...मुझे याद आता है कि गाँवों में हम लड़के मिल जुलकर सारा काम करते थे। यह ठेकेदार वगैरह तो आज आए हैं। गाँवों में आप अभी भी जा कर देखिए, खाना परोसने से लेकर बारात की पूरी खातिरदारी तक का काम गाँव वाले मिल जुल कर ही करते हैं।

"अभी तो नहीं, जब लगेगी तो बिलकुल याद करेंगे जी। आपको नहीं कहेंगे तो किसको कहेंगे।"

"बिलकुल ठाकुर साहब, कोई भी काम हो, कोई भी ज़रूरत हो तो आधी रात को आवाज़ दीजिएगा.....।"

"एक छोटी सी समस्‍या है.... हमारे घर बहुत से मेहमान आ गए हैं। काफ़ी भीड़ हो गई है। यदि आपके घर में एक कमरा मिल जाए तो कुछ लोगों को उसमें रूकवा सकते हैं।"

"हाँ क्‍यों नहीं...पर..." मैं कुछ बोलता रूक गया। मुझे याद आया कि मेरे सास-ससुर भी तो आने वाले हैं।

"अब क्‍या बताएँ ठाकुर साहब, मेरे सास-ससुर भी कल ही आने वाले हैं। वो ठहरे बूढ़े लोग। ऐसे में कमरा देना तो संभव नहीं हो पाएगा। यदि आप चाहें तो कहीं किराए से लेने के लिए तलाश करूँ?"

"नहीं। फिलहाल तो नहीं। जब लगेगी तब देखेंगे। अरे हाँ, आपके घर पानी का बड़ा ड्रम है। वह एकाध हफ़्ते के लिए मिल जाता तो...? दरअसल पानी की खपत बहुत बढ़ गई है, इसलिए...।"

"ज़रूर, क्‍यों नहीं।" मैंने कहा। तभी मुझे ध्‍यान आया कि आजकल पानी की कटौती चल रही है। कई बार नल एक ही टाइम आता है, ऐसे में ड्रम देने से गड़बड़ हो जाएगी। "ओह, ठाकुर साहब, आपको तो पता ही है, मेरे सास-ससुर आ रहे हैं, बूढ़े लोग हैं, तो पानी की खपत बढ़ जाती है। मैं माफ़ी चाहता हूँ, यदि आप कहें तो मैं किसी टेंट वाले से बात करूँ, उनके पास एक्‍स्‍ट्रा ड्रम होता है।"

"नहीं कोई बात नहीं, फिलहाल तो काम चल ही रहा है। जब ऐसी नौबत आएगी तो मैं खुद ही टेंट वाले से बात कर लूँगा।"

"कोई और काम हो तो अवश्‍य बताइएगा।"

"ज़रूर। अरे हाँ, आपके यहाँ एक सिलेंडर एक्‍स्‍ट्रा है क्‍या? हमारा गैस वाला आज शाम तक डिलीवरी करेगा।"

"गैस... " मुझे याद आया कि एक बार हमने इसी तरह एक दिन के लिए सिलेंडर पड़ोस के खान साहब को दिया था। एक हफ़्ते तक उन्‍होंने सिलेंडर नहीं लौटाया और इसी बीच हमारी गैस ख़त्‍म हो गई थी।

"हमारा सिलेंडर भी खाली पड़ा है। हमने तो दो तीन दिन पहले बुक कराया था, पर पता नहीं क्‍यों.. अभी तक आया नहीं, मैं आज पता करता हूँ।"

"कोई बात नहीं जी, मैं कहीं और देख लेता हूँ।"

"और कोई बात हो तो आप निस्‍संकोच...."

"यह भी कोई कहने की बात है?"

मैं बहुत शर्मिंदा हूँ, और किसी न किसी तरह ठाकुर साहब की कोई मदद करना चाहता हूँ। मेरी अपनी विवशताएँ है, इसी कारण... पर यक़ीन करें। मैं सच्‍चे दिल से उनकी मदद करना चाहता हूँ।

Tuesday, October 16, 2007

मेरे घर में जो कलेश होगा, उसका कौन जिम्‍मेदार है___?


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


आज मैं कैशियर की पोस्‍ट से रिटायर हो रहा हूँ। मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है, कि अब मैं अपना पूरा समय बच्‍चों के साथ बिता सकता हूँ। इस विदाई पार्टी में मेरी पत्‍नी नहीं आ सकीं, परंतु मेरे दोनों बेटे तथा दामाद आए हुए हैं। वह जो कैमरे से फोटो खींच रहा है, मेरा बड़ा लड़का है। मैं बहुत आभारी हूँ कि आप लोगों ने कोई ऐसा-वैसा चुटकुला नहीं सुनाया है।

मन बड़ा इमोशनल हो रहा है। मैं दरअसल देहात का हूँ इसलिए बात-बात पर मेरे मुँह से गाली निकल जाती है। इस नौकरी के दौरान कई लोगों से मेरी गाली-गलौच हुई। सैक्‍शन हैड से एक बार जूता-चप्‍पल भी हो चुका है, क्‍योंकि उन्‍होंने मेरी छुट्टी स्‍वीकार नहीं की थी। परंतु मुझे यह जानकर बहुत अच्‍छा लग रहा है कि आप लोगों में किसी ने भी मेरी बातों का बुरा नहीं माना है। जैसा कि सैक्‍शन हैड ने अभी बताया मैं साफ़ दिल का आदमी हूँ, जो कुछ जुबान पर आता है बोल जाता हूँ। कोई बात अपने दिल में नहीं रखता। यह अच्‍छी क्‍वालिटी है।

अपना सारा चार्ज मैंने पहले ही दे दिया है, परंतु सैक्‍शन हैड की सर्विस बुक छिपाकर रखी थी। मुझे ऐसा लग रहा था कि वह रिटायरमेंट के समय का क्‍लेम देने में कुछ दिक्‍कत कर सकते हैं। परंतु मेरे क्‍लेम का चेक आ चुका है। सर, मुझे माफ़ कर दीजिए, आपकी सर्विस बुक दरवाज़े के पास वाली केबिनेट के सबसे निचले खाने में है।

मेरे घर में भी कुछ जलपान की व्‍यवस्‍था है। मैंने ढोल बजाने वाला भी बुलवा लिया है, और मेरी इच्‍छा है कि मैं हार पहनकर ढोल बजवाते हुए जुलूस निकालकर अपने घर जाऊँ। आप सभी जो अपना गला तर करना चाहते हैं, कृपया जुलूस में मेरे साथ घर चलें।

आपने सब ने मिलकर राधा-कृष्‍ण की यह सुंदर मूर्ति मुझे उपहार दी है। मैंने सुना है कि पहले सरस्‍वती की मूर्ति पसंद की थी, पर कुछ लोगों को धारणा है कि मुझे राधा-कृष्‍ण अधिक सूट करते हैं, चलो कोई बात नहीं। यह भी भगवान हैं।

सैक्‍शन हैड ने मेरा लगभग सारा क्‍लेम आज ही दिलवा दिया, इसके लिए मैं आभारी हूँ। पर अभी भी इन्‍हें जरा भी अक्‍कल नहीं आई है। हार पहनाते और राधा-कृष्‍ण की मूर्ति देते समय दाँत फाड़कर फोटो खिंचवाया, पर चेक को सबको खोलकर क्‍यों दिखा रहे हैं___!

इसमें साढ़े सात लाख रूपए लिखे हैं, यह भी ज़ोर से पढ़कर सुना दिया है। आप तो वाहवाही लूट गए। अब मेरे घर में इसके लिए जो कलेश होगा, उसका कौन जिम्‍मेदार है___?

अगले साल इनका भी रिटायर होने का नंबर है। मैं अपने साथियों से प्रार्थना करता हूँ कि सैक्‍शन हैड साहब को अपने क्‍लेम का चेक भेंट करें तो उसमें देरी नहीं होनी चाहिए। कोई काम हो तो बेशक मुझे बुलवा लें। मैं फ्री में इनके क्‍लेम के लिए भाग-दौड़ करने को तैयार हूँ। इनका चेक, रिटारयरमेंट वाले दिन ही इनके सारे परिवार के सामने दिखाकर, फोटो खिंचवाकर भेंट होना चाहिए।

Sunday, October 14, 2007

इतनी मँहगाई में नया प्‍यार कहाँ मिलेगा____


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मेरा नाम सुरेंदर है। हमारा गाम दसरतपुर हरियाणा में पड़ता है जी। हमारे गाँव में बेकारी बहुत है। मेरा मेन काम तो लोहार का है। मैं अपनी दुकान को वर्कशॉप कहता हूँ। अब आप ही बताओ, जिस दुकान में लोहे का काम होता हो, उसे वर्कशॉप कहना क्‍या गलत है।

आज मैं आपको अपना दुख बताता हूँ जी। मेरी आधी उमर हो गई पर मेरे माँ बाप ने मेरी शादी ना करी। कहते हैं कि कहीं लड़की नहीं मिलती। उनका भी क्‍या दोष। हमारे इलाके में बहुत कम लड़कियाँ हैं जी, तो शादी के लिए लड़की नहीं मिलती।

पर मैं हाथ-पे-हाथ धरकर ना बैठा। काफ़ी भागी-दौड़ी की तो जाकर एक नेपाल की छोकरी मिली। पूरे पाँच हजार नक़द देने पड़े। उससे शादी करी। तब जाकर जिंदगी में कुछ रौनक आई। पैसा तो फिर आ जावेगा पर एक बार उमर निकल गई तो ना आने की।

मेरा एक चचेरा भाई था जी, उमर में मेरे से बड़ा था और वह भी छड़ा (अविवाहित) था। उसने बड़ा धोखा किया मेरे साथ। वह मेरे घर आता-जाता रहता था। मैं भी सोचता, मेरी घरवाली से थोड़ा हँस-बोल लेता है तो इसमें मुझे क्‍या दिक्‍कत है। यह गाँव तो आप जानते ही हो, यहाँ तो रेगिस्‍तान है जी। इसमें जनानी के पास घड़ी दो घड़ी बैठने से कोई तसल्‍ली पावे है तो इससे ज़्यादा पुण्‍य का काम कोई नहीं होता।

वह मेरी घरवाली को भगा ले गया और वह इसी गाँव में दूसरे घर में रहने लगी है। मैंने उससे बहुत झगड़ा किया पर अब वह यहाँ आने को राजी नहीं है। कहती है उसी के साथ रहूँगी। मैं अपने चचेरे भाई से फौजीदारी तो कर नहीं सकता था। इसमें खून-खराबा भी हो सकता था। सो मैं पंचायत गया।

मैंने पंचों से कहा कि मुझे अपनी घरवाली वापस चाहिए। उसे कभी कोई दुख-तकलीफ दिया हो तो मेरी ग़लती। पर उन्‍होंने मेरी बात ना सुनी। मेरी घरवाली कहती है कि अब उसे मेरे चचेरे भाई से प्‍यार हो गया है सो वह उसी के साथ रहेगी। मैंने पंचों से कहा कि मेरी घरवाली लौटा दे, चाहे मेरे से पाँच हज़ार और ले और अपने लिए दूसरी ले आए। पर पंचायत ने फैसला सुना दिया कि इसमें जबरदस्‍ती नहीं चल सकती। यदि इसकी मर्जी है तो वह मेरे चचेरे भाई के साथ ही रहेगी। पर इसके लिए मैंने जो पाँच हजार खर्च किए थे, उसे मुझे लौटाने का हुक्‍म सुना दिया।

मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे प्‍यार में क्‍या खोट थी। मैं भी तो जी-जान लगा के प्‍यार करता था। पाँच हजार रूपए वापस तो मिल गए हैं पर अब मँहगाई बहुत बढ़ गई है। इतने में ऐसी सुंदर जनानी कहाँ मिलगी।

मेरा अभी भी अपने चचेरे भाई से मेल-जोल बना हुआ है। मैं अब उसके घर आता-जाता हूँ। जब तक कोई दूसरी नहीं मिल जाती, इसी से हँस-बोलकर गुजारा करना है____

Saturday, October 13, 2007

हम कथा कीर्तन करने वाले लोग हैं, हमारा रहन-सहन बिलकुल सादा है....


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मेरा नाम हरिशरण शास्‍त्री है। अब आपसे क्‍या छिपाना, शास्‍त्र वगैरह की कोई उपाधि नहीं मिली है। जाति से शर्मा ब्राह्मण हूँ। रामकथा कहता हूँ तो भक्‍तजनों ने स्‍वयं ही शास्‍त्री कहना प्रारंभ कर दिया, तो ठीक है। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। आप हमें प्रेम से जिस नाम से पुकारें, उसी नाम से हम आपकी सेवा में हाजिर हो जाएंगे।

पहले मैं कथा, शादी-ब्‍याह, हवन इत्‍यादि करवाता था। पर कहते हैं न कि ज्ञानी वही है जो समय के साथ परिवर्तित हो जाता है। मेरी रूचि भी भगवत्कथा कहने में थी। लोग कथा शैली की प्रशंसा करते थे, तो मैंने भागवत तथा रामकथा कहना प्रारंभ कर दिया। अब ढेर सारे भक्‍त हो गए हैं।

आजकल लोगों की पसंद काफ़ी बदल गई है। लोग हम साधुओं से न जाने कैसी कैसी आस लगाए रहते हैं। कोई चाहता है कि मैं उन्‍हें योग की बारीकियाँ बताऊँ, तो कोई जन्‍मपत्री बनवाना और पढ़वाना चाहता है। बड़ी मुश्किल हो जाती है।

भक्‍तों का विश्‍वास तोड़ने का जी नहीं करता। इसलिए हाथ और माथा वगैरह देखकर भविष्‍य तो बता ही देता हूँ। विपत्तियों का तोड़ पूछते हैं, तो उन्‍हें हवन इत्‍यादि के उपाय बता देता हूँ। रत्‍न पहनने की सलाह मैं नहीं देता क्‍योंकि डरता हूँ कि कोई किसी पुखराज या मूँगे की अंगूठी लेकर आ जाएगा और सही है या गलत, जानना चाहेगा तो उसे संतुष्‍ट करना कठिन हो जाएगा।

आध्‍यात्‍म के क्षेत्र में माँग और पूर्ति का अध्‍ययन करने के बाद मैंने रामकथा और भागवत के क्षेत्र में काम करने का निश्‍चय किया है। गोसांई तुलसीदास भी कहते हैं कि रामकथा सुनने से हज़ारों यज्ञों का फल अनायास ही मिल जाता है।

कथा के समय दो-चार भक्‍त हारमोनियम तथा मंजीरे में संगत भी देते हैं, जिससे कथा और कीर्तन का मिला जुला संगीतमय आध्‍यात्मिक वातावरण बन जाता है। ये लोग तो विशुद्ध संगीतकार हैं, हमारी तरह साधू-संत नहीं हैं, इसलिए इनका पारिश्रमिक तो देना होगा। आप तो समझते हैं, कथा में इनका महत्‍व कितना अधिक होता है।

मेरा अपना तो कोई खर्चा नहीं है। आश्रम के लिए जो उचित लगे दे दीजिएगा। रहने की चिंता बिलकुल न करें। आप जैसे किसी गृहस्‍थ के घर में रह लूँगा। मैं भोजन भी एक ही टाइम करता हूँ। दो रोटी दूध के साथ, बस और कुछ नहीं। कोई ताम झाम मत करिएगा। दूसरे टाइम बस एक कटोरा काजू, किशमिश और फलाहार करता हूँ। सुबह नाश्‍ते में सादा हलुआ देसी घी में बनवा दीजिएगा। और पीने के लिए दो गिलास गाय का औटाया हुआ दूध आधी कटोरी शहद के साथ दे दीजिए।

सप्‍ताह में दो दिन तो उपवास ही रहता हूँ। उपवास के दिन मात्र चिरौंजी और किशमिश का सेवन करता हूँ। इसी तरह कुछ कंद मूल, फल-फूल खाकर, गौ माता का दूध पीकर....... अरे कहाँ चले जजमान.....सुनिए तो...... मेरे साथ मेरे कुछ चेले भी हैं जो जय-जयकार करने के लिए साथ ही चलते हैं..... ये लोग भी शाकाहारी ही हैं.........

Thursday, October 11, 2007

कंप्‍यूटर चलाना बच्‍चों का खेल नहीं है___


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मैं यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हूँ, रिटायरमेंट के लिए चार साल बचे हैं। अब अपनी बात क्‍या बताऊँ, यहाँ बड़ी पॉलिटिक्‍स है। जो टैलेंटेड लोग हैं उन्‍हें आगे बढ़ने का मौक़ा ही नहीं मिलता। मुझे भी हर क़दम में बड़ी फाइट करनी पड़ी है।

अभी दो माह पहले की बात है। डिपार्टमेंट में कंप्‍यूटर आया। उसे हेड साहब ने अपने कमरे में लगवा लिया जबकि मेरे कमरे में लगना चाहिए था, क्‍योंकि मैंने यू.एस. में रिसर्च वर्क के दौरान कंप्‍यूटर पर बहुत काम किया था। इसलिए मुझे ही मालूम है कि कंप्‍यूटर कितना सो‍फेस्टिकेटेड इंस्‍ट्रूमेंट होता है, और उसे कैसे हैंडल करना है। ख़ैर, जब दूसरा कंप्‍यूटर आया तो उसके लिए मैंने पूरी फ़ाइट की और अपने कमरे में रखवा लिया।

मुझे कोई परेशानी नहीं है, आप भी आइए, इसमें काम कीजिए और अच्‍छे से ढक कर चले जाइए। पर मुझे लगता है कि यहाँ इंडिया में लोगों को इसे ठीक से हैंडल करना आता नहीं है। सही गलत-सलत बटन दबाते हैं और ख़राब कर देते हैं।

अभी परसों ही मैंने सुनील को डाँटा। अभी टेंपरेरी है पर जब तब काम करने के बहाने मुँह उठाए कंप्‍यूटर पर बैठ जाता है।

"सुनिए मिस्‍टर, आप इस कंप्‍यूटर चेयर धीरे बैठा करिए। यह बड़ा सो‍फेस्टिकेटेड होता है। इसमें झूला मत झूलिए।"

"ओके सर। मैं ध्‍यान रखूँगा।"

"और आप इतनी तेज़ी से कीबोर्ड पर बटन क्‍यों दबाते हैं। एक-एक अक्षर बारी-बारी से जाने दीजिए। एक साथ कई अक्षर भेजते हैं तभी तो कंप्‍यूटर हैंग हो जाता है।"

"बट सर, कीबोर्ड पर बटन तो..."

"अब आप मुझे मत समझाइये, कॉपी-पेस्‍ट करने के लिए आपको एडिट में जाना चाहिए। आप शार्टकट से कर लेते हैं। मैं आपसे बड़ा हूँ इसलिए आपके भले के लिए बताता हूँ कि ज़िंदगी में कभी भी शार्टकट अपनाना ठीक नहीं है।"

"पर इसमें शार्टकट...."

"आप इसमें म्‍यूज़ि‍क कैसे चलाते हैं। इट इज़ नॉट मेंड फ़ॉर म्‍यूज़ि‍क। आपको म्‍यूजिक सुनना है तो अलग साउंड सिस्‍टम ले आइए...."

"सॉरी सर, मैं...."

"आई वोंट एलाऊ यूज़लेस वर्क हियर! आप बताइए मुझे इसे पासवर्ड लॉक कैसे किया जाता हैं?"

"सर, जहाँ तक मेरी जानकारी है पासवर्ड का प्रोवीज़न नहीं है।"

'अच्‍छा !! मैं इतना तो जानता हूँ कि पासवर्ड सिस्‍टम हर कंप्‍यूटर में होता है। आप मत बताइए, मैं इसके इंजीनियर से पूछ लूँगा। गेट आउट!"

पता नहीं क्‍या, आज कल के लौंडे आप को फन्‍ने खाँ समझते हैं। मैं तब से कंप्‍यूटर चलाता हूँ जब तुम पैदा भी नहीं थे। जब जी चाहा, बिना हाथ पैर वाश किए कंप्‍यूटर में आ जाते हैं। कहीं इसमें वायरस आ गया तो?

Tuesday, October 9, 2007

वह इस क़ाबिल नहीं, कि अपनी ज़िंदगी ठीक से गुज़ार पाए___


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


काले कोट का अपना अलग महात्‍म्‍य होता है। वक़ील काला चोगा पहनते हैं, और हम टी.सी. लोग काला कोट। टी.सी., यानि कि ट्रेन के टिकट चेकर, आप टी.टी.ई. भी कह सकते हैं। आपके लिए बात एक ही है।

"देखिए सर, कोई बर्थ खाली हो तो...", उस व्‍यक्ति ने बड़ी आशा भरी नज़रों से देखा। यह बात दूसरे दर्जे के स्‍लीपर डिब्‍बों की है। उसके पास वेटिंग टिकट था।

"कोई चांस नहीं, पूरी गाड़ी फुल है।" मैंने उसकी ओर बिना देखे ही जवाब दिया।

लोगों को अकसर यह ग़लतफ़हमी होती है कि हम उनकी तरफ़ गौर नहीं करते हैं। यूँ तो हमारी नज़र चार्ट पर रहती है, परंतु हम सामने वाले की औक़ात का अंदाज़ा बख़ूबी लगा लेते हैं। लोग आशा भरी नज़रों से हमें घेरकर खड़े होते हैं मानों प्रसाद पाने में वे कहीं वह पीछे न रह जाएँ।

वह व्‍यक्ति एक महिला के साथ यात्रा कर रहा था। ज़रूरतमंद तो था ही, पर उसकी ज़रूरत दूसरों से ज़्यादा है, मुझे इसका कोई संकेत नहीं मिल पाया। जो यात्री अनुपस्थित होते हैं, उनकी खाली सीटों को हम नियमानुसार आबंटित कर देते हैं।

मैं कुछ देर बाद उसके पास गया और बोला - "अपनी टिकट दिखाइए", उसने टिकट सामने कर दी।

"एक सीट महिला कोटे की है, दे रहा हूँ", और मैंने उसके टिकट पर सीट नंबर लिख दिया।

"थैंक्‍यू सर!" वह खुश हो गया।

"बस। खाली थैंक्‍यू? कुछ दक्षिणा नहीं देंगे?" मुझे आखिरकार खीझ आ गई। लोग एक बर्थ के लिए दो-तीन सौ रूपए तो वैसे ही दे देते हैं।

"ज़रूर सर।" और उसने दस रूपए का नोट निकाल लिया।

"बस! दस रूपए!"

"जी। बस इतना ही।" वह बोला। मैं एक मिनट तक उस दस रूपए को उलट पलट कर देखता रहा, शायद और कुछ निकाले। पर उसने उल्‍टे ऐसी नज़रों से देखना शुरू किया जिसका मतलब साफ था कि यदि आपको दस रूपए मंज़ूर नहीं, तो लौटा दीजिए।

"मैं हाथ आई लक्ष्‍मी को नहीं ठुकराता", मैंने वह नोट जेब में रख लिया।

वह इस क़ाबिल नहीं था कि मैं उससे कुछ बहस करूँ। वह इस क़ाबिल भी नहीं था पूरी ज़िंदगी में कभी भी कनफ़र्म बर्थ हासिल कर पाता। मैं यही सोचता हूँ कि वह अपनी लाइफ़ कैसे गुज़ारेगा...। आपको क्‍या लगता है?

Sunday, October 7, 2007

काश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक भारत एक है___!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मैं दिल्‍ली पुलिस का सिपाही हूँ। एक बार रिश्‍तेदारों के साथ वैष्‍णोदेवी के दर्शन करने चल पड़ा। बाहर आना जाना हो तो अपनी खाक़ी वर्दी पहन लेता हूँ, इसका बड़ा रौब पड़ता है। सभी लोग वर्दी की इज़्ज़त करते हैं इस नाते अपनी भी इज़्ज़त हो जाती है।

माता की कृपा से यात्रा बड़ी अच्‍छी रही। माता के दर्शन हो गए। घर लौटते वक़्त थोड़ा पंगा पड़ गया। कोई दस-बारह साल का लड़का जम्‍मू स्‍टेशन में केले बेच रहा था।

"ओए इधर आ" मैंने ट्रेन से उसे हाथ देकर बुलाया। "केले कैसे दिए, इधर दिखा"।

उसके कानों में जूँ न रेंगी।

"ओए इधर आ" मैंने फिर आवाज़ लगाई।

"आप पैसे नहीं दोगे" उसने कहा।

"रूक साले।" मैंने उसका गिरहबान पकड़ना चाहा। पर वह तेजी से छुड़ाकर भाग गया। इसी दौरान मेरी घड़ी गिरकर टूट गई। वह दूर खड़ा दाँत दिखाता रहा।

मुझे ताज्‍जुब हुआ कि वह कमबख़्त कैसे जानता था कि मैं उसे पैसे नहीं देने वाला हूँ। मैं तो उससे पहले कभी मिला ही नहीं। वह मेरी वर्दी देखकर समझ गया था। कमीने ने रिश्‍तेदारों के सामने मेरा पानी उतार दिया।

मैं खड़ा-खड़ा उसका सारा खानदान एक करता रहा। मन किया कि पकड़कर मजा चखाऊँ, वह जानता था मैं उसे दौड़ाकर पकड़ नहीं पाऊँगा।

Wednesday, October 3, 2007

सिस्‍टम से काम करो, तो कस्‍टमर को सैटिस्‍फैक्‍शन होगा।


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मेरा छोटा सा गैराज है बल्कि यूँ कहो कि स्‍कूटर और मोटरसाइकिल रिपेयरिंग की दुकान है। स्‍कूटर रिपेयरिंग में इस गैराज का अच्‍छा खासा नाम है। आस-पास के इलाके का हर कस्‍टमर इस गैराज पर आता है। मैं खुद भी काम करता हूँ, तथा चार-पाँच और लड़के रखे हैं। इनमें 3 को तनख्‍वाह देता हूँ और दो अभी छोटे हैं, काम सीख रहे हैं।

गैराज चलाना बड़ा मुश्किल है। दो मिनट के लिए किसी काम से इधर-उधर जाओ, तो कामचोरी चालू हो जाती है। एक-एक लड़के को अपने हाथों से काम सिखाता हूँ।

ऐसे भी कस्‍टमर आते हैं, छोटे बच्‍चों को काम करता देखकर उनका जी पसीज जाता है, कभी कभी वह पढ़ने की सलाह भी देते हैं। मैंने अपने लड़कों से साफ़ कह रखा है, सिर्फ़ काम पर ध्‍यान देना है, कस्‍टमर की बात पर ध्‍यान नहीं देना है। यह सब बड़े लोगों के टाइम पास की बातें हैं। एक-दो लड़के छोटे हैं, इन्‍हें दुनियादारी की समझ नहीं है, धीरे-धीरे सारी बातें समझ जाएंगे।

अभी कल की ही बात है, एक लड़के को डाँटना पड़ा। एक स्‍कूटर का क्‍लच ढीला था, उसने अपनी उंगलियों से उसका नट टाइट कर दिया। काम हो गया, कस्‍टमर थैंक्‍यू बोलकर चलता बना।

मैंने हज़ार बार समझाया है "बेटे, चोट लग सकती है। ऐसे कभी अपने हाथों से कोई नट-बोल्‍ट टाइट मत करो, रिंच और पेंचकस लेकर जाओ। कोई नट ढीला हो तो उसे निकालकर दुकान से दूसरा नट लगा दो।"

नहीं जनाब, पैसे की बात नहीं है, सिस्‍टम की बात है। मैं एकाध नट का पैसा यूँ भी नहीं लेता। सिस्‍टम से काम करो तो कस्‍टमर को भी सैटिस्‍फैक्‍शन होगा। बच्‍चे अभी नादान हैं, इस बात को समझने में इन्‍हें टाइम लगेगा।

Tuesday, October 2, 2007

अब वह क़ानून तोड़ने की जुर्रत कभी नहीं करेगा!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


आज हमारे पुलिस थाने में मकानदार और किराएदार का झगड़ा आया। मकानदार ने दो लड़कों को किराए पर कमरा दिया था। दोनों साल भर रहे, और अब छोड़ते समय दो महीने का किराया देने में अनाकानी करने लगे, मांगने पर गाली-गलौच करने लगे। दोनों पक्षों में हाथापाई की नौबत आ गई।

इस शहर में डकैती, क़त्‍ल के इतने सारे अपराध हो रहे हैं, उन पर ध्‍यान दें कि इनका झगड़ा निपटाएँ। पर क़ानून दोनों पक्षों ने तोड़ा है। साफ पुलिस केस है। कार्रवाई तो करनी पड़ेगी।

दोनों किराएदार लड़कों को दो-दो थप्‍पड़ लगाए और दोनों ने बड़ी आसानी से बक़ाया किराया दे दिया। मकानदार ने भी क़ानून तोड़ा था। किसी भी व्‍यक्ति को अपने घर किराए पर रखने से पहले उसने पुलिस को सूचित नहीं किया था। उसे भी बिठा लिया। उसकी यह ग़लती बड़ी गंभीर थी, इससे कोई आतंकवादी वारदात भी हो सकती थी।

उसे अच्‍छी तरह से समझाया कि उसका अपराध कितना गंभीर है। घबराइये नहीं, उसे थप्‍पड़ नहीं लगाया। वह खुद ही आकर 10 हज़ार रूपए दे गया। अब वह क़ानून तोड़ने की जुर्रत कभी नहीं करेगा।

Monday, October 1, 2007

खाता खुलवाने के लिए यही बैंक मिला है!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


इतनी देर से मेरे काउंटर के सामने खड़ा है और बैंक के खाता खोलने का फ़ॉर्म मांग रहा है। मैं उसे अनदेखा कर अपने दूसरे कामों में व्‍यस्‍त होने का दिखावा कर रहा हूँ। मुझे दिखावा करने की क्‍या ज़रूरत है? मेरे पास वैसे ही बहुत काम है।

"अभी फार्म खत्‍म हो गए हैं कल आना!"

वह फिर भी नहीं टलता। मैं उठकर अंदर टेलीफ़ोन करने चला जाता हूँ। उसे लगता है कि मैं उसकी जिद से हार मानकर फ़ॉर्म लाने कहीं अंदर गया हूँ। इन लोगों ने तंग कर रखा है। यहाँ वैसे ही बहुत भीड़ रहती है। इतने सारे दूसरे बैंक हैं, उनकी अच्‍छी-अच्‍छी सुविधाएँ है, तो वहाँ जाकर अपना खाता क्‍यों नहीं खुलवाते।

वह अभी भी डटा है।

"क्‍या एक बार में सुनाई नहीं देता!" मैं झल्‍ला उठा। हमें भी इनसे नाराजगी से बात करना अच्‍छा नहीं लगता, पर क्‍या करें मज़बूरी है। इतनी डांट-डपट न करें तो यह हमारा जीना मुश्किल कर देंगे।

वह वापस जा रहा है। पर मैं जानता हूँ कि वह कल वह फिर आएगा। कमबख़्त ने परेशान कर दिया। पब्लिक डीलिंग का काम सचमुच कितना टेंशन वाला है।

Friday, September 28, 2007

पुष्‍पा देवी से क्‍या काम है? हमसे कहिए___

पुष्‍पा देवी हमारी पत्‍नी का नाम है। हाँ वही सरपंच पुष्‍पा देवी। घर पर ही हैं, परंतु आपको उनसे क्‍या काम है? हमसे कहिए!

इस देश के सरकार की इच्‍छा थी कि यहाँ से सरपंच कोई महिला बने, सो हमने यह अपनी धर्मपत्‍नी पुष्‍पादेवी को बना दिया है। सरकार ने अपना काम कर लिया, पर हमें तो अपना काम अपने हिसाब से ही करना है। सभ्‍य परिवारों की महिलाएँ पंचायत पर जाकर नहीं बैठतीं। यह काम हम ही देखते हैं। जिसका काम उसी को साजै। उनका काम है रोटी बनाना और बच्‍चे पैदा करना। और इस काम में वह माहिर है।

क्‍या? आपको उनसे मिलना है? ठीक है। यह रहीं श्रीम‍ती पुष्‍पा देवी। घूँघट में ही ठीक हैं। मुँह देखकर क्‍या कीजिएगा। अच्‍छा ! उनसे दस्‍तखत करवाना है? लीजिए यहाँ हमारे पास लाइए, हम करे देते हैं।

दस्‍तखत में कोई गड़बड़ी नहीं है। आप बेफ़ि‍क्र और बेधड़क होकर जाइए, सारे रिकॉर्ड में ऐसे ही दस्‍तखत हैं।

Wednesday, September 26, 2007

हाँ! मैं तुम्‍हारा किसान भाई हूँ, मुझे अपने घर ले चलो।


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

मेरा नाम मंगत राम है। पढ़ा लिखा नहीं हूँ। खेती बहुत कम है इसलिए कभी मज़दूरी तो कभी खेती कर अपना गुज़ारा करता हूँ। जिस गाँव में मैं रहता हूँ वह शहर के पास ही है। कभी कभार वहाँ के अफ़सर झुंड बनाकर गाँवों का दौरा करते हैं। गाँवों का दुख देखकर दुखी होते हैं, हमारे फ़ायदे की बातें बताते हैं, फ़ोटो वगैरह खिंचवाते हैं और चले जाते हैं।

पढ़े लिखे लोग, सूट बूट पहनकर हमारे लिए इतनी चिंता करते हैं, जानकर बहुत अच्‍छा लगता है। चाहें तो वह अपने-अपने घरों में भी बैठकर अपनी रिपोर्टें बना सकते हैं, उनसे कौन पूछने वाला है? पर नहीं, ये गाँवों की धूल खाते हैं, हमारी समस्‍याएँ सुनते हैं, हमारे साथ इतने आदर से बात करते हैं, यहाँ के शुद्ध हवा पानी की तारीफ़ करते हैं, और हमारा कलेजा गर्व से फूल जाता है।

हम ही इनका सत्‍कार ठीक से नहीं कर पाते। भाषण देने के लिए माइक का इंतज़ाम तो कर दिया पर बिजली नहीं रहती इसलिए माइक चलता नहीं। इन्‍हें बिना माइक के बोलना पड़ता है। इनमें से कई लोगों का गला बैठ जाता है।

सभी भाषण की शुरूआत करते हैं - "किसान भाइयों!" और उसके बाद कोई ग़रीबों के लिए कल्‍याण की बात करता है, कोई ग्रामीणों और कोई किसानों की बात करता है। सभी लगभग एक जैसी बात करते हैं। बस कभी उनके मुँह से किसान, कभी ग़रीब और कभी ग्रामीण निकलता है। उन्‍हें "किसान", "ग़रीब" और "ग्रामीण" तीनों समानार्थी लगते हैं। सचमुच, कितनी महत्‍वपूर्ण बात है। जो गाँवों में रहता है, उसकी आजीविका के लिए खेती ही बची है इसलिए वह किसान हुआ, और जो किसान है उसका ग़रीब होना स्‍वाभाविक है। इसलिए बात एक ही है। शब्‍द कुछ भी हो, बात हमारी ही होती है।

पता नहीं क्‍यों मुझे आजकल "किसान भाइयों!" सुनना अच्‍छा नहीं लगता। मन करता है कि भाषण रोक कर कहूँ, "ठीक है, मैं तुम्‍हारा किसान भाई हूँ मुझे अपने घर ले चलो। अपने घर-द्वार का आधा हिस्‍सा मुझे दे दो।"

Tuesday, September 25, 2007

मशीनें हमें सिखाती हैं!

मशीनों ने अपने काम से लोगों को कई प्रकार की सीख प्रदान की है। कोई यह सीखता है कि अनुशासन क्‍या है और कोई यह कि बिना रुके कैसे लगातार काम करते हैं। मैं यहाँ उन रिकॉर्डिंग मशीनों की बात कर रहा हूँ जो टेलीफ़ोन के साथ जोड़ी जाती हैं, तथा मधुर आवाज़ में कॉल करने वालों का मार्गदर्शन करती हैं।

थोड़ा फ़्लैश बैक... दो साल की बात है। मैं बिजली के दफ़्तर (हेल्‍पलाइन पर) फोन करता था, मेरा फ़ोन उठाने के लिए वहाँ कोई मौजूद नहीं होता। घंटी बजती जाती। मैं फिर फोन करता, फिर घंटी बजती जाती। ऐसा प्रतीत होता कि वहाँ बैठा व्‍यक्ति अत्‍यंत व्‍यस्‍त है और उसे फ़ोन उठाने का वक़्त नहीं मिल पा रहा है। कभी-कभी तो फ़ोन के इंगेज होने की टोन सुनाई पड़ती। यह टोन घंटों तक क़ायम रहती। ऐसा जान पड़ता कि उस फ़ोन पर बैठा व्‍यक्ति किसी अज्ञात ज़रूरतमंद से बात कर रहा है और उसकी समस्‍या हेल्‍पलाइन पर ही हल कर रहा है। कभी भूले-भटके कोई उठा लेता तो उसके बात करने का अंदाज़ अत्‍यंत रूखा होता। लगता कि समस्‍या का समाधान भले न हो पर बात तो ठीक से होनी चाहिए।

शायद उन्‍हें यह बात जँच गई, कि समस्‍या का समाधान हो न हो, पर बात तो मीठी होनी चाहिए। उन्‍होंने वहाँ कोई मशीन लगाई। अब एक घंटी बजने के बाद संगीतमय मीठी आवाज़ में उत्तर मिलता – "यहाँ (दफ़्तर का नाम) में आपका स्‍वागत है। आपकी कॉल हमारे लिए महत्‍वपूर्ण है।" और बाक़ी की घंटी उसके बाद बजती रहती। इधर फ़ोन करने वाले की कॉल का मीटर चल पड़ता। शिकायत तो दर्ज नहीं जो पाती पर अब मेरी हिम्‍मत नहीं कि मैं बार-बार फ़ोन करता। उन्‍होंने ग्राहकों को मीठी आवाज़ सुनाने वाली समस्‍या का समाधान जो कर दिया था।

अभी पिछले दिनों की बात है। मैंने इंटरनेट ख़राब होने की शिकायत दर्ज करने के लिए अपने इंटरनेट प्रदाता (महानगरों की जीवनरेखा) के हेल्‍पलाइन नंबर पर फ़ोन किया। हेल्‍पलाइन नंबरों की विशेष बात यह है वह बेहद आसान होते हैं ताकि उन्‍हें डायल करने में कोई कठिनाई न हो, मैं गदगद हो गया, उन्‍हें हमारा कितना ख्‍याल है। अब नंबर डायल करने पर मीठी आवाज ने अहसास दिलाया कि मेरी कॉल उनके लिए कितनी महत्‍वपूर्ण है और एक-एक कर मुझसे कई नंबर दबवाए। ताज्‍जुब की बात है कि वह आवाज़ एक स्‍वचलित मशीन से आ रही थी। इसी मशीन ने मेरा प्रतीक्षा काल 100 सेकंड बताया जिसे मैंने सब्र से बिताया। अभी तक किसी जीवित व्‍यक्ति से कोई बात नहीं हो पाई थी। 100 सेकंड बीत गए, मशीन बताती रही कि मेरी अहमियत उनकी नज़रों में कितनी ज़्यादा है, मैं अपनी बारी का इंतज़ार करता रहा, 200, 300, 400 सेकंड भी बीत गए पर मेरा प्रतीक्षाकाल समाप्‍त नहीं हुआ।

मैंने फिर से नए सिरे से दो-तीन बार प्रयास किया पर हर बार यही हुआ। ऐसा लगा कि काश! यह बोलने वाली मशीन मेरे सामने होती, या इसे लगाने वाला व्‍यक्ति मुझे कहीं मिल जाता ! मैने सब्र से काम लिया। इस मशीन ने सिखाया कि मनुष्‍यों को परेशानी में सब्र से काम लेना चाहिए।

इसी मशीन में एक विकल्‍प था कि मैं अपना नाम तथा फ़ोन नंबर बोलकर दर्ज करा दूँ ताकि मेरी बारी आने पर कस्‍टमर केयर अधिकारी स्‍वयं फ़ोन कर लेगा। मैंने यह भी किया। अपना नाम तथा फ़ोन नंबर पिछले तीन दिनों से 4 बाद दर्ज करा चुका हूँ पर अभी तक किसी का फ़ोन नहीं आया।

इससे भी मुझे एक सीख मिली। वह सीख थी "कर्म किए जा, फल की इच्‍छा मत कर!"

Saturday, September 22, 2007

प्रिंटर खराब है ! Printer is Out of Order !

मैं कोई ऐरा-गैरा प्रिंटर नहीं हूँ, मेरी ड्यूटी सरकारी बैंकों में पासबुक अपडेट करने में लगाई जाती है। हर आम ग्राहक (जिसके लिए पासबुक की नियमित एंट्री मायने रखती है), मेरी सलामती की दुआ मांगता है, क्‍योंकि मैं आए दिन खराब घोषित कर दिया जाता हूँ। बैंकों में खराब होने वाला इकलौता प्रिंटर होता हूँ, जिसके खराब होने से सबसे ज़्यादा ग्राहकों को मायूस होना पड़ता है।

मैं जब भी खराब होता हूँ, पूरे दिन अपनी जगह पर पड़ा रहता हूँ। ग्राहक गवाह हैं कि मुझे मरम्‍मत के लिए कहीं नहीं भेजा जाता, और न ही कोई इंजीनियर मुझे दुरूस्‍त करता दिखाई पड़ता है। फिर भी कुछ ऐसा चमत्‍कार होता है‍ कि अगले दिन (यदि खराब रहने का दिन न हो तो) मैं चल पड़ता हूँ। शायद खराबी मामूली होती है जो बिना किसी मशक्‍कत के ठीक हो जाती है। परंतु अफ़सोस होता है, कि पूरे दिन अनेक ग्राहक मायूस लौट जाते हैं। मेरा कोई भाई बंद नहीं होता। पूरे बैंक में मैं अपने काम के लिए इकलौता होता हूँ।

पहले-पहल मेरे खराबी की सूचना काउंटर पर बैठा व्‍यक्ति बोलकर देता था। फिर सादे काग़ज़ पर लिख कर देने लगा। अब तो बक़ायदा एक सुंदर और टिकाऊ बोर्ड बनाया गया है। जिसमें हिंदी तथा अंग्रेज़ी दोनों में सुंदर, सुपाठ्य शब्‍दों में मेरे खराब होने की बात लिखी गई है, ताकि पढ़ने वाले को भी आराम रहे और जब भी ज़रूरत हो मुझे तुरंत लगाया जा सके।

ऐसा लग रहा है जैसे किसी ऑफ़ि‍स में ''माँ बीमार है, इ‍सलिए ---- दिन से ---- दिन की छुट्टी चाहिए'' वाले आवेदन पत्र को थोक में छपवाकर रख लिया है कि आवेदन देने वालों और पढ़ने वाले, दोनों को कम-से-कम कष्‍ट हो।

Thursday, September 20, 2007

दस्‍तूर ही ऐसा है, इसमें हमारी क्‍या गलती है।

फोटो : साभार BBCHindi.com

क्‍या मायावती जी, आपने तो हमारी नौकरी भी छीन ली है। एक तो अपना घर-द्वार बेचकर घूस दिया, हाथ पैर जोड़कर नौकरी मिली, वह भी छिन गई। अब आप कहेंगी कि घूस देना ग़लत है। अरे भाई, बिना घूस लिए आजकल नौकरी कोई देता है? वह भी पुलिस की? हाँ आप लोगों की नहीं दिया उन्‍हें दे दिया, यह ग़लती हो गई। हमारे लिए तो जैसे आप वैसे वो। हमारे जेब से कहीं तो जाना था, सो चला गया। हमने नौकरी की खुशी में पार्टी भी दे डाली थी। उसका बीस हज़ार का खर्चा अलग हुआ। बापू को हमारे जैसा होनहार बेटा पैदा करने पर नाते-रिश्‍तेदार और गाँववाले बधाई दे चुके है। हम भी गाँव के बच्‍चों को खूब पढ़-लिख कर कुछ बनने की तैयारी का लेक्‍चर दे चुके हैं। अब इन सब को क्‍या मुँह दिखाएंगे?

इतना ही नहीं, बहन के लिए अपने जैसा ही एक कमाऊ और होनहार लड़का देखकर रिश्‍ता पक्‍का किए थे। अभी शादी नहीं हो पाई थी कि उसकी नौकरी भी चली गई। नौकरी वाला लड़का ढूँढने में कितनी मेहनत लगती है क्‍या आप जानती हैं? सोचा था होनहार है, दरोगा लग गया है, बहन को कोई तक़लीफ़ नहीं होगी, पर हमारे सारे अरमान मिट्टी में मिल गए। और तो और, दहेज का एक लाख रूपया एडवांस भी दे चुके हैं, वह कैसे वापस मिलेंगे।

अब आप यह मत कहना कि दहेज लेना-देना भी ग़लत है।

Tuesday, September 18, 2007

उस पोस्‍टर में क्‍या लिखा था ?

कल टीवी में एक ख़बर आ रही थी कि जमशेदपुर में एक दंपति ने अपने वक़ील को कई दिनों से बंदी बनाकर रखा था। अरविंद गुहा नाम व्‍यक्ति तथा उसकी पत्‍नी का मानना था कि उसके अपने वक़ील ने मुक़दमे में मिलीभगत कर उन्‍हें जानबूझकर हरा दिया है। इस बंदी वक़ील को छुड़ाने के लिए जब पुलिस पहुँची तब उस दंपति ने वक़ील की हत्‍या कर दी। इससे संबंधित खबर का वीडियो यहाँ देखा जा सकता है -



इसमें एक पोस्‍टर भी दिखलाई दिया।


यह मुझे एक आम हत्‍या से कहीं बढ़कर लगती है क्‍योंकि इसमें दंपति ने कुछ छिपाया नहीं था बल्कि अपनी शिकायत का भरसक ढिंढोरा पीटा था। यहाँ तक कि अपने घर की दीवार में पोस्‍टर में काफी कुछ लिख कर महीनों से टाँग रखा था।



मैं इसकी तहरीर जानना चाहता हूँ। यह जानना चाहता हूँ कि अक्षरश: इस पोस्‍टर में क्‍या लिखा गया था।

Sunday, September 16, 2007

यहाँ पूछताछ करना मना है !

अभी पिछले दिनों यहाँ के एक बड़े अस्‍पताल जाना हुआ। मैं दिल्‍ली में रहता हूँ, और यहाँ का एक बड़ा अस्‍पताल है राममनोहर लोहिया अस्‍पताल। वैसे तो मैं दिल्‍ली के अनेक अस्‍पतालों के चक्‍कर काट चुका हूँ क्‍योंकि घर में कोई न कोई बीमार लगा रहता है। इस बार श्रीमती जी का नंबर था।

काफी बड़ा अस्‍पताल है। इसमें लोग अकसर लोग रास्‍ता भटक जाते हैं। एक मरीज को एक ही बीमारी के इलाज लिए कई जगहों पर जाना पड़ता है। पहले परची बनवाने (अलग अलग कैटैगरी की पर्ची अलग-अलग बनती है), फिर डॉक्‍टर के कमरे में, और फिर यदि कोई टेस्‍ट लिख दिया है तो पैसा जमा करवाने, टेस्‍ट की तारीख लेने, तय तारीख पर टेस्‍ट कराने तथा उसकी रिपोर्ट लेने। इन सब के लिए अलग-अलग कमरे निर्धारित हैं। यह कमरे कभी कभी तो अलग-अलग बिल्डिंगों में स्थित होते हैं। यदि नया आदमी हो तो निश्चित रूप से रास्‍ता भटक जाए।

इतनी बार आते-जाते रहने के बावजूद हमें भी किसी एक मुकाम तक जाने के लिए अनेक बार कई जगह और पूछना पड़ता है। यदि किसी कमरे में घुसकर पूछना चाहो कि भैया फलाँ कमरा कहाँ है, तो वह बोर्ड दिखा देता है जिसमें लिखा होता है 'यहाँ पूछताछ करना मना है'। शायद उन्‍होंने यह अपनी सहूलियत के लिए लिख रखा होगा कि यदि सबका जवाब देते रहे तो अपना काम कब करेंगे? वह बेचारे भी इतनी भीड़ को देखकर चिड़चिड़े हो जाते हैं। और इसी कारण वह सवाल पूछने वाले पर खफा हो जाते हैं। उन्‍हें खफा होने का हक है, क्‍योंकि हमारे पूछताछ से उनके कष्‍ट में अनावश्‍यक बढ़ोत्‍तरी हो जाती है। वह तो भला हो कतार में लगे लोगों का, जो आपकी मदद करते हैं। उनमें से अनेक तो ऐसे मिल जाएंगे जिनका रोज का आना-जाना है। वह आपकी पूरी मदद करते हैं, क्‍योंकि वह भी हमारे पाले में होते हैं।

जब भी मैं अस्‍पताल जाता हूँ, मेरा दिल दहल जाता है। मरीजों के रिश्‍तेदार ही उनका स्‍ट्रेचर खींच कर यथास्‍थान पर ले जाकर टेस्‍ट इत्‍यादि का काम करते हैं, क्‍योंकि वहाँ के स्‍टाफ के भरोसे रहे तो यह काम नहीं होगा। पिछली बार अस्‍पताल से बाहर निकलते समय एक वृद्ध जोड़ा दिखा जो एक दूसरे को सहारा देकर धीरे-धीरे अस्‍पताल में जा रहा था। दोनों में कौन स्‍वस्‍थ है, यह पता नहीं चलता था, या शायद दोनों बीमार थे। वह तो सीढ़ी भी नहीं चढ़ सकते हैं। या शायद सहारा लेकर धीरे-धीरे कर चढ़ेंगे। लिफ्ट से भी जा सकते हैं। पर यदि उन्‍हें एक दो अन्‍य कमरों में जाना पड़ा तो कहाँ पूछेंगे? पूछताछ के लिए शायद कोई खिड़की जरूर होगी जहाँ बैठा कोई कर्मचारी बिना किसी रूखे लहजे के उन्‍हें गंतव्‍य कतार तथा कमरे का पता विस्‍तार से समझाएगा। मुझे पूरा विश्‍वास था कि बूढ़े आदमी के लिए तो इस नियम में, कि 'यहाँ पूछताछ करना मना है' कुछ समय के लिए ढील दी जाएगी।

Thursday, September 13, 2007

दो हाथ मेरे भी

पिछले कुछ दिनों से अंतर्जाल पर भटकते हुए अचानक हिंदी वेबसाइटों पर नज़र पड़ी तो जैसे कोई खजाना मिल गया। इतने सारे ब्‍लॉग, इतने विचार विमर्श चल रहे हैं, और मैं उनसे अब तक वंचित था। खैर, देर आए दुरूस्‍त आए। जब इतनी बड़ी कार सेवा चल रही है, तो उसमें मेरा भी योगदान होना चाहिए। जहाँ भी कुछ नया बड़ा काम होता दिखे उसमें फौरन अपने भी दो हाथ लगा देता हूँ। इन हाथों से महायज्ञ का कोई भला हो न हो, पर इनका कल्‍याण ज़रूर हो जाएगा।