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Thursday, November 22, 2007

तारीफ़ करो लेकिन संभलकर______ !


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मैं कैलाश वर्मा, डिग्री कॉलेज यमुनानगर में अर्थशास्‍त्र का लेक्‍चरर हूँ। आज अर्थशास्‍त्र विषय की बहुत पूछ है। पहले ऐसा नहीं था। पहले जो लड़का पढ़ाई में कमज़ोर होता था किसी तरह डिग्री पूरी करने के लिए अर्थशास्‍त्र विषय ले लिया करता था। परंतु मैं ऐसे लोगों में शामिल नहीं था। मैं चाहता तो आसानी से साइंस या कोई अन्‍य विषय मिल सकता था, परंतु मैंने अपनी रुचि से अर्थशास्‍त्र चुना, और देखिए, एक से एक होशियार बच्‍चे अर्थशास्‍त्र पढ़ रहे हैं।

यहाँ हमारे विभाग के लोग मेरी दूरंदेशी और समझ का लोहा मानते हैं। किसी भी बात में मैं अपनी राय सबसे अंत में देता हूँ क्‍योंकि मेरी राय ज़रा हटकर होती हैं। मैं ऐसे पहलुओं पर विचार करता हूँ जिन पर किसी और की नज़र नहीं जा पाती। लोग मेरी बात सुनकर चकित रह जाते हैं, "यार! यह तो हमने सोचा ही नहीं था।"

पिछले हफ़्ते रीडर आरती सिन्‍हा ने विभागाध्‍यक्ष का चार्ज सम्‍हाला। अपना पुराना कमरा छोड़कर विभागाध्‍यक्ष के कमरे में शिफ़्ट कर लिया। जैसी कि परंपरा है, सारे लोग बधाई देने पहुँचे। मैं सबसे अंत में बधाई देने पहुँचा।

"मैडम, कांग्रेच्‍यूलेशंस! आपमें तो बिलकुल चेंज आ गया।" आज मैडम खूब सज-धज कर आई थीं। और विभागाध्‍यक्ष के पद का रौब तो देखते ही बनता था।

"अच्‍छा ! क्‍या चेंज आया है?" मैडम की आँखें चमक रही थीं। वह शायद अपनी तारीफ़ सुनना चाहती थीं।

"आप पहले से ज़्यादा कर्मठ दिखाई दे रही हैं। काम में जुटी हुईं।" मैं जानता था कि पहले बधाई देने वाले लोग नए कमरे की, उनके चमक-दमक की खूब तारीफ़ कर चुके होंगे।

"मतलब, क्‍या मैं पहले काम नहीं करती थी?" मैंडम ने दूसरा अर्थ लगा लिया।

"नहीं, मेरा मतलब था कि पहले आप पुराने कमरे में अपने दूसरे कामों में व्‍यस्‍त रहती थीं...." लगता है मैंने कुछ ग़लत बोल दिया।

"दूसरे कामों में ? यहां ऑफिस के इतने काम होते हैं, क्‍लास, सेमीनार, स्‍टुडेंट्स को गाइड करना क्‍या काम नहीं होते?" उन्‍होंने उखड़े लहज़े में कहा।

"मैं तो इसलिए कह रहा था कि पहले आपके काम एकेडेमिक होते थे, आपके एकेडमिक काम तो लोगों को दिखाई नहीं पड़ते न! अब जब एडमिनिस्‍ट्रेटिव होंगे, तब सबको पता चलेगा।" मैंने बात को संभालने की कोशिश की।

"हाँ, सच है। जब तक दूसरों को तंग न करो, काम की गिनती ही नहीं होती।" मैडम ने कहा। दरअसल पहले भी उनके काम पर कई सवाल उठे होंगे। शायद इसीलिए उन्‍होंने यह बात पकड़ ली।

मैं खिसिया कर रह गया। मन में आया कि कह दूँ, "हाँ, तुमने अपनी पूरी जिंदगी लिपस्टिक पोत कर दूसरों की चुगली की है। आज तक कोई काम नहीं किया है। और अब भी नहीं करोगी। तुम्‍हारे बस का कोई काम है भी नहीं।" पर चुपचाप लौट आया। मैं टीका-टिप्‍पणी नहीं बल्कि तारीफ़ कर रहा था, पर मेरी राय को मैडम ने ग़लत तरीक़े से ले लिया था। कहते हैं न, कि "जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।"

मैंने एक बात और अनुभव की है, औरतों की तारीफ़ करो तो बहुत संभल-संभलकर। आपकी अच्‍छी भली बात से वह क्‍या मतलब निकाल ले, आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते।

अभी कल की ही बात है। मैंने बातचीत के दौरान हल्‍के-फुल्‍के मूड में अपनी पत्‍नी से कहा कि उसे वक़ालत पढ़ना चाहिए। उसमें ऐसा गुण है कि वह वक़ालत में बहुत क़ामयाब हो सकती है। इस पर वह नाराज़ हो गई, और लड़ने लगी। अब आप ही बताइए, इसमें नाराज़ होने वाली क्‍या बात है ? वक़ील होना कोई गाली तो नहीं है! और क्‍या किसी को कैरियर एडवाइस देना भी ग़लत है?

Friday, September 28, 2007

पुष्‍पा देवी से क्‍या काम है? हमसे कहिए___

पुष्‍पा देवी हमारी पत्‍नी का नाम है। हाँ वही सरपंच पुष्‍पा देवी। घर पर ही हैं, परंतु आपको उनसे क्‍या काम है? हमसे कहिए!

इस देश के सरकार की इच्‍छा थी कि यहाँ से सरपंच कोई महिला बने, सो हमने यह अपनी धर्मपत्‍नी पुष्‍पादेवी को बना दिया है। सरकार ने अपना काम कर लिया, पर हमें तो अपना काम अपने हिसाब से ही करना है। सभ्‍य परिवारों की महिलाएँ पंचायत पर जाकर नहीं बैठतीं। यह काम हम ही देखते हैं। जिसका काम उसी को साजै। उनका काम है रोटी बनाना और बच्‍चे पैदा करना। और इस काम में वह माहिर है।

क्‍या? आपको उनसे मिलना है? ठीक है। यह रहीं श्रीम‍ती पुष्‍पा देवी। घूँघट में ही ठीक हैं। मुँह देखकर क्‍या कीजिएगा। अच्‍छा ! उनसे दस्‍तखत करवाना है? लीजिए यहाँ हमारे पास लाइए, हम करे देते हैं।

दस्‍तखत में कोई गड़बड़ी नहीं है। आप बेफ़ि‍क्र और बेधड़क होकर जाइए, सारे रिकॉर्ड में ऐसे ही दस्‍तखत हैं।