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Thursday, September 13, 2007

दो हाथ मेरे भी

पिछले कुछ दिनों से अंतर्जाल पर भटकते हुए अचानक हिंदी वेबसाइटों पर नज़र पड़ी तो जैसे कोई खजाना मिल गया। इतने सारे ब्‍लॉग, इतने विचार विमर्श चल रहे हैं, और मैं उनसे अब तक वंचित था। खैर, देर आए दुरूस्‍त आए। जब इतनी बड़ी कार सेवा चल रही है, तो उसमें मेरा भी योगदान होना चाहिए। जहाँ भी कुछ नया बड़ा काम होता दिखे उसमें फौरन अपने भी दो हाथ लगा देता हूँ। इन हाथों से महायज्ञ का कोई भला हो न हो, पर इनका कल्‍याण ज़रूर हो जाएगा।