मेरा नाम बजरंगी देवांगन, कलापथक प्रमुख, रायपुर का रहने वाला हूँ। कलापथक ऐसी सरकारी कला मंडली होती है जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए सरकार की योजनाओं का प्रचार प्रसार करती है। मुझे तो पता ही नहीं था कि ऐसी भी कोई सरकारी नौकरी होती है जिसमें काम गाने बजाने का हो। मुझे शुरू से ही गाने बजाने का शौक़ था। मेरी तो लाटरी ही लग गई थी।
हमें कलेक्टर के अंडर काम करना पड़ता है। शुरू में तो काम में मज़ा आया, पर बाद में बड़ा बेकार लगने लगा। हमें ग़रीबी हटाओ, परिवार नियोजन, पढ़ो-पढ़ाओ जैसे विषयों पर गीत गाना पड़ता। हमारे गीत भी कहीं और से लिखे आते, कोई रस नहीं, कोई भाव नहीं, बस आदेश होता गीत गाना है। मोटे-मोटे अफ़सर, जिन्हें कला और संगीत के बारे में क ख भी पता नहीं होता, वह हमें बताते कि क्या गाना है और कब गाना है।
समझ लो हम सरकारी भांड हैं। किसी भी कार्यक्रम में जहाँ कलेक्टर या किसी बड़े अधिकारियों का दौरा होता, हमें भेज दिया जाता। हमारा काम भीड़ जुटाना था, जब तक कि कलेक्टर साहब वहाँ पहुँच न जाएँ। पहले बहुत बुरा लगता था कि कोई हमारा गीत बीच में रोककर अपना भाषण शुरू कर दे, पर धीरे-धीरे इसकी आदत हो गई।
मैं अब अपने काम में बिलकुल परफेक्ट हूँ। आप कोई भी कार्यक्रम बताइए, एड्स नियंत्रण या पोलिया टीकाकरण, उसके बारे में आधा पेज लिख कर दीजिए, चुटकी बजाते किसी भी लोकगीत या फिल्मी गीत में फिट कर सकता हूँ। बस गीत तैयार। आपको मज़ा नहीं आ रहा है तो इससे मुझे क्या। मैं आपके मनोरंजन की परवाह करूँ या अपनी नौकरी करूँ? माफ़ कीजिएगा बाबूजी, पर बदलती दुनिया के साथ-साथ मैं भी जीना सीख गया हूँ।
विकासखंड अधिकारी, राजस्व अधिकारी, तहसीलदार, पंचायत प्रमुख और यहाँ तक कि एन.जी.ओ. के लोग भी हमारे चारों ओर डोलते हैं, कहते हैं "बजरंगी भाई, आप जैसे कलाकार की हमारे कार्यक्रम में उपस्थिति ज़रूरी है।" उनका मतलब होता कि
कि "बजरंगी भाई, हमारे कार्यक्रम में आकर मुफ़्त में गाना-बजाना कर दो।" अव्वल तो हम हर किसी कार्यक्रम में जाते नहीं, यदि गए भी तो ऐसा गाते-बजाते हैं कि किसी को सुनाई ही न दे। लोगों को ढोलक, हारमोनियम की आवाज़ बस सुनाई देती है पर समझ में कुछ नहीं आता। जब तक आयोजक लोग माइक सेट करते हैं हम दो गीत गाकर ब्रेक ले लेते हैं।
लोग आखिरी में हमारे मन की बात कह देते हैं-"इससे अच्छा तो नाचा या भजन मंडली बुलवा लेते।" यही तो हम भी चाहते हैं कि अगली बार नाचा बुलवा लें तो हमारी बला टले। हमें संतोष है कि हमारी नौकरी पक्की है हमारा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। अब थोड़ा गाली खा लेने से, या थोड़े घटिया साबित होने से हमारी कलाकार बिरादरी के किसी भाई को रोज़गार मिले तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है___!